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हम इन्सानियत के शायर है मुसलमानों के नही – मुनव्वर राना

हम इन्सानियत के शायर है मुसलमानों के नही – मुनव्वर राना
मुलाखतकार

जाने-माने उर्दू शायर मुनव्वर राना महसूस कर रहे हैं कि मुल्क में इन दिंनो एक खास विचार थोपा जा रहा है और इसीलिए नाराजगी जताते हुए उन्होंने हाल ही में ‘साहित्य अकादमी अवार्ड’ वापस कर दिया. राना के इस फैसले पर मीडिया में  काफी हंगामा हुआ…तो मै मोदी के जूते उठाऊंगा इस जुमले के सबब सोशल मीडिया ने उन पर सवालिया निशान भी लगाए. जाहिर है, इस मसअले के बाद यह जज्बाती शायर बेहद मायूस है. बकौल राना, ‘ मेरे आंसू सिर्फ इखलाक के नही है. इसमें नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, प्रो. कलबुर्गी के आंसू भी शामिल है. हम इन्सानियत के शायर है मुसलमानों के नही. अवार्ड वापसी और उसके बाद उपजे बवाल पर मुनव्वर राना से ‘ लोकमत समाचार ’ ने खास बातचीत की. प्रस्तुत है चुनिंदा अंश….

मोदी के जूते उठाने वाला मसअला क्या था ?
उ- दादरी में जाकर मोदी मुल्क से माफी मांगते है और वादा करते हैं कि जब तक वे मुल्क के मुखिया हैं, फसाद नहीं होने देंगे, तो मैं उनके जूते भी उठा सकता हूं- यह बात मैंने कही थी. उसी बात को आज मैं फिर दोहरा रहा हूं. अफसोस कि सबने अपने हिसाब से इसको बयां किया.

प्रधानमंत्री से क्या चाहते हैं ?
उ- समाज को राह दिखाने की जिम्मेदारी हम पर है. हम अगर अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभा नहीं पाए तो यह बात हमें जिंदगीभर खलती रहेगी. हमारे बच्चे ने अगर कोई गलती की  है तो हम माफी मागेंगे क्योंकी हम उसे तमीज नही सिखा पाए, कबूल करना होगा कि हम कसूरवार हैं. मुझे लगता है कि दादरी में जो कुछ हुआ उसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को माफी मांगनी चाहिए.

अवार्ड वापसी का ख्याल क्यों आया ?
उ- अगर एक दाढीवाला कहीं जा रहा है- अब्दुल रहमान, शेख, मुजीब अहमद या ऐसा ही कुछ उसका नाम है तो क्या वो आतंकी हो गया ? किसी आम आदमी को मार जालने वाले आतंकी नही हुए ? …. तो मैंने लिखा कि इखलाक के धर पर ये आतंकी हमला था. उस पर मुझे बडी गालिंया पडीं. बडा हंगामा हुआ. में बर्दाश्त नहीं कर सका तो मैंने सोचा यही एक हथियार मेरे पास है जिसे मैं वापस कर सकता हूं. 28 लोगों ने अवार्ड वापस किए लेंकिन सबसे ज्यादा हंगामा मेरे अवार्ड वापस लौटाने से हुआ. दादरी तो एक बहाना है. पिछले कुछ दिनों से मुल्क नाजुक दौर से गुजर रहा है.

आपको प्रधानमंत्री कार्यालय से बुलावा आया है ?
उ- यह सच है कि फोन आया था. मैंने कहा आपने हमें याद किया यह हमारी खुशकिस्मती है. आप बुलाना चाहते हैं तो हमारे साथ और आठ-दस लोगों को बुला लीजिए, मैं भी हाजिर हो जाऊंगा… पर बात आगे कुछ बढी नही.

एक लीडर के तौर पर मोदी के बारे में क्या सोचते हैं क्या उन पर भी नज्म लिखने का इरादा है ?
उ- अगर मोदी अच्छा काम करते हैं तो जरूर उन पर भी लिखूंगा. मुमकिन है उन्होंने पार्टी के लिए अच्छा काम किया हो, लेकिन मुल्क के लिए काम अभी तक नहीं हुआ है.

आज के बदतर हालात देखकर उन पर एहतिराज जताने के लिए अवार्ड लौटाना कहां तक जायज है  इससे क्या हासिल होगा ?
उ- मैं शायर हूं. कलम ही मेरा हथियार है. मेरठ, मलिहाना, भागलपुर और दिल्ली के 1984 के फसाद की भी मैंने मजम्मत की थी. हमारे एहतिराज की आवाज से पुरा हिंदुस्तान ना हिले तो फायदा क्या है ? जब बिजली कदकती है तो पानी जरूर बरसता है… अगर ना बरसे तो समझ लीजिए किसानों की तकदीर खराब है. यहां तक हम ले आए कि बादल गरजने लगे. अगर फिर भी कुछ बदलाव नही हुआ तो समझेंगे शायर की कलम कुछ नही कर सकती.

अब जबकि मोदी सरकार है, आपने अवार्ड लौटाया है. इसके पहले आपने सोनिया गांधी पर नज्म लिखी थी. इसका क्या मतलब निकालें ?
उ- मैं आडवानी के साथ लद्दाख गया था. सिंधु नदी और आडवानी पर लेख लिखा था. आरएसएस और तरूण विजय पर भी लिखा. मैंने किस पर क्या लिखा ये सोचने के बजाय ये देखिए कि मैंने इन्साफ किया कि नहीं. मुझसे बढ कर कोई सेक्युलरिज्म का नुमाइंदा अगर आपके पास हो, तो मुकाबले में ले आइए, मैंने सोनिया गांधी पर नज्म इसलिए नहीं लिखी कि वह कॉंग्रेस की लीडर है बल्कि, इसमें वो औरत है जिसे हिंदुस्तान ब्याह के लाया था. उसके शौहर को मार दिया गया. जिसके दो बच्चे हैं. अब ना वो इसाई रह गई ना हिंदू. वो अकेली हो गई है. मेरी उनसे कभी मुलाकात नही हुई. सुना है उनके ड्राइंग रूम में यह नज्म लगी हुई है.

बात करते हुए मुनव्वर राणा कई बार जज्बाती हो जाते है. इसी बात पर किसी टीवी एंकर ने एक बार उनसे पूछा य़ा कि उनकी आंखो में अक्सर आंसू क्यों आ जाते है राना ने कहा आप जर्नलिस्ट होकर अंगारो को आंसू कहते है किसी को देखकर रोते हुए हंसना नही अच्छा. ये वो आंसू है जिनसे तख्त ए सुलतानी पलटता है.
उ- एक बार पाकिस्तान के किसी टीवी चैनल से फोन आया. उन्होंने मुनव्वर राना के शेर-वतन में रोज सजाए जाते हैं मक्तल मेरे लिए ‘राना’, वतन में रोज मेरा इम्तहान होता है! का हवाला देकर पूछा, ‘मिस्टर राना, वतन में आपका फिर इम्तहान हो रहा है? राना का जवाब था, ‘ये हमारे मुल्क की बात है. हम लडते है, झगडते है,  समझ लेते है. मेरा ख्याल है कि इसमें आपकी दखलअंदाजी जरूरी नही’. उधर से फोन रख दिया गया.

मुलाखत : मुनव्वर राना
मुलाखतकार  : संजय मेश्राम
स्त्रोत  : लोकमत समाचार 

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